18 पुराणों में से एक शिव पुराण में भगवान विष्णु से जुडी एक ऐसी कथा का वर्णन किया गया है जिसमे ये बताया गया है कि श्रृष्टि के पालन कर्ता ने एक बार सती साध्वी स्त्री के पतित्व को नष्ट किया था। तो आइये अब हम जानते है कि कौन थी सती साध्वी पतित्व स्त्री और भगवान विष्णु ने उसके पतित्व धर्म को नष्ट क्यों किया था।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी को तुलसी विवाह कराया जाता है और इसी तिथि के बाद शादी विवाह आदि शुभ कार्य आरम्भ किये जाते है जिन परिवार में पुत्री नहीं होती वह तुलसी का सालीग्राम के साथ विवाह कराकर कन्या का दान कर फल प्राप्त करते है और जो स्त्री कार्तिक मास को स्नान करती है वे तुलसी जी तथा सालीग्राम का विवाह भी करते है। तुलसी जी के विवाह को पुरे विधि विधान से खूब गाजे बाजे के साथ किया जाता है।
तुलसी विवाह की लोक कथा :
एक परिवार में एक ननद सच्चे मन से तुलसी माता की विशेष पूजा करती थी लेकिन उसकी भाभी को यह सब पसंद नहीं था वह अक्सर ही गुस्से में अपने ननद को कोसते रहती और कहती कि दहेज़ में अपनी ननद को तुलसी ही दूंगी, बारातियों को भी खाने में तुलसी ही पारोसोंगी। अब एक दिन ऐसा आया जब ननद का रिश्ता तय हो गया और शादी के दिन जब बारातियों के स्वागत की जगह भाभी ने तुलसी का गमला फोड़ दिया लेकिन भगवन श्रीहरी की कृपा से वह अनेक प्रकार के व्यंजनों में बदल गया। भाभी को ये सब रास नहीं आया और जब उन्होंने ननद के गहने की जगह तुलसी के पत्तो की माला पहना दिया तब वह पत्तो का हर क्षण भर में सोने की हार/माला में बदल गया। इसके बाद भाभी ने ननद के वस्त्रो की जगह जनेऊ रख दिया और वह जनेऊ भी क्षण भर में रेशमी कपड़ो में बदल गया।
जब उसकी ननद अपने ससुराल में पहुचती है वहां पर दुल्हन की बहुत बड़ाई हुई तब भाभी को तुलसी पूजा का महत्व समझ में आया । कहते है यदि आपके मन में श्रध्दा नहीं है तो पूजा करने से फल फुल चढाने से या स्वादिष्ट व्यंजन बनाने से कोई लाभ नहीं मिलता लेकिन मन में श्रध्दा और विश्वास हो तो एक फूल भी बहुत कुछ होता है। उसके बाद भाभी ने अपनी बेटी को तुलसी माता की पूजा करने को प्रेरित किया परन्तु उसकी बेटी ने उसकी एक नहीं सुनी और जब उसकी बेटी के शादी के समय वह अपनी बेटी के साथ भी वैसा किया जैसा उसने अपने ननद के साथ किया था तो तुलसी माता उस बेटी को आशीर्वाद देगी यह सोचकर भाभी ने अपनी बेटी के विवाह में वही सब किया जो ननद के विवाह में किया था।
बेटी के विवाह में जब भाभी ने तुलसी के गमले को तोड़ने की कोशिश किया तो तुलसी का गमला टुटा लेकिन कोई चमत्कार नहीं हुआ तथा तुलसी की माला भी वैसा का वैसा ही रहा कोई परिवर्तन नहीं हुआ इस प्रकार समाज में बेटी और परिवार की बहुत निंदा हुई। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी भाभी ने अपनी ननद को कभी भी घर पर नहीं बुलाया एक दिन भाई ने सोचा की क्यों न मैं ही अपनी बहन से मिलने के लिए उसके ससुराल चला जाऊ जिससे की मैं अपनी बहन से मिल भी लूँगा और उसका हाल चाल भी जान लूँगा,
तब उसने अपनी पत्नी से अपने मन कि बात कही और कुछ उपहार स्वरुप ले जाने के लिए कहा इस पर भाभी ने उसके थैले में ज्वार का दाना रख कर दे दिया बड़े भाई को बहुत दुःख हुआ उसने सोचा कि वह बहन के घर ज्वार का दाना लेकर कैसे जाये तब उसने रास्ते में एक गौ माता के सामने थैला पलट दिया तब माता तुलसी की कृपा से वह सारा ज्वारका दाना सुन्दर उपहार/आभूषण और सोने चांदी के आभूषण में बदल गया तब गौ मालिक ने कहा की आप सोने चांदी के आभूषण गाय को क्यों दे रहा है।
तब भाई ने देखा और उसके आश्चर्य हुआ तब उसने गौ मालिक को सारी बात बताई गौ मालिक बोला यह सब माता तुलसी की कृपा है। भाई भी ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बहन के घर गया उसके द्वारा लाये गए उपहार देखकर बहन तथा ससुराल वाले बहुत खुश हुए। इस पर भाई ने अपने मन में स्मरण किया कि हे तुलसी माता आपने मेरी बहन पर कृपा बनाये है ठीक उसी प्रकार सब पर अपनी कृपा बनाये रखना। जय तुलसी माँ इस प्रकार तुलसी विवाह की लोक कथा इस प्रकार पूर्ण होती है।
तुलसी विवाह की पौराणिक कथा :
एक बार शिव भगवान ने अपना तेज समुद्र में फेक दिया था उस तेज से एक महा तेजस्वी बालक ने जन्म लिया वह बालक आगे चलकर जलंधर(दैत्य) के नाम से पराक्रमी दैत्य/दानव बना और उसके राजधानी का नाम जलंधर नगरी था। जलंधर का विवाह दैत्य राज कालनेमि की पुत्री वृंदा के साथ हुआ अपनी सत्ता के अंहकार में वह देवी माता पार्वती को पाने की लालसा/लालच से कैलाश पर्वत पर गया उसने अपनी माया से भगवान शिव का ही रूप धारण कर लिया और माता पार्वती जी के पास गया परन्तु देवी पार्वती ने अपने तपो बल से उसे तुरंत ही पहचान लिया तथा अंतर ध्यान हो गई। देवी पार्वती ने क्रोध होकर सारी बाते भगवान विष्णु को बताया।
जलंधर की पत्नी वृंदा एक पतिव्रता स्त्री थी उसके पतिव्रत के कारण से जलंधर को न तो मारा जा सकता था और ना हि वह पराजित या विजित हो सकता था इसलिए जलंधर का नास/सर्वनाश/विनाश/ करने के लिए वृंदा का पति धर्म भंग/ध्वंस/विध्वंस करना बहुत जरुरी था इसी उद्देश्य से भगवान विष्णु एक ऋषि का वेश धारण करके वन में जा पहुचे वहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थी।
भगवान् श्रीहरीविष्णु के साथ दो मायावी राक्षस भी थे जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत/डर/ हो गई ऋषि ने वृंदा के सामने पल/क्षण भर में ही दोनों राक्षसों को भस्म/मार कर दिया उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जलंधर के बारे में पूछा तब ऋषि ने अपने माया जाल से एक वानर को प्रकट किया अब वानर के एक साथ में सिर तथा दुसरे हाथ में जलंधर का धड़ था वृंदा अपने पति की यह दशा देखकर मुरचित होकर गिर गई।
जब होश में आया तब उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की वह उसके पति को जीवित करे भगवान ने अपनी माया से उन्हें जलंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया परंतु वह स्वयं भी उसी शरीर में प्रवेश हो गया। वृंदा को इस छल/कपट का जरा सा भी आभास/पता नहीं हुआ और जलंधर बने भगवान के साथ वृंदा के पति जैसा व्यहार करने लगा जिससे उसका पतिव्रत/पतित्व/पतिव्याहर धर्म भंग हो जाये ऐसा होते ही युध कर रहा जलंधर युध में मारा/पराजित हो गया।
इस सारी लीला/माया जाल के बारे में जब वृंदा को पता चला तो वृंदा घुस्से से भगवान विष्णु को शील/पत्थर होने का श्राप दे दिया अपने भक्त के श्राप को विष्णु जी ने स्वाकार्य किया और सालीग्राम पत्थर बन गए। जब विष्णु पत्थर बन गए तब पुरे ब्रम्हाण्ड में असंतुलन की स्थिति बन गई यह देखकर सभी देवी देवताओं ने वृंदा से विनती की वह भगवान विष्णु को श्राप मुक्त करे इस प्रकार वृंदा ने विष्णु जी को श्राप से मुक्त किया और स्वयं आत्मदाह कर लिया।
जहाँ वृंदा आत्मदाह दिया था वहां पर तुलसी का पौधा उग गया तब भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा हे वृंदा तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी सभी अधिक प्रिय हो गई हो अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी तब से हर साल कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन तुलसी विवाह किया जाता है। जो मनुष्य तुलसी जी का सालीग्राम के साथ विवाह करवाते है वह इस लोक में सुख प्राप्त कर अंत में मोक्ष को प्राप्त होते है।

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